भोपाल। दीपावली के पर्व को पारंपरिक रंगों और हस्तशिल्प की खूबसूरती से सजाने के उद्देश्य से गौहर महल में गुरुवार से दीपोत्सव मेला 2026 का शुभारंभ हुआ। मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम और माटीकला बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस मेले में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए 50 से अधिक शिल्पी अपनी कलाकृतियों और पारंपरिक उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं। मेले में हस्तनिर्मित सजावटी वस्तुओं से लेकर मिट्टी के आकर्षक दीयों तक की विविधता देखने को मिल रही है। यह मेला 7 नवंबर तक चलेगा।
इस बार मेले की खास विशेषता मिट्टी के कारीगरों की भागीदारी है। दीपावली के मुख्य अवसर को ध्यान में रखते हुए पहली बार मिट्टी के कारीगरों के एक विशेष समूह को आमंत्रित किया गया है। इस समूह के शिल्पी मिट्टी से तैयार दीयों और पारंपरिक कलाकृतियों का अनूठा संग्रह लेकर पहुंचे हैं। इन उत्पादों में परंपरा, स्थानीय कला और कारीगरों की रचनात्मकता की झलक दिखाई दे रही है। मिट्टी से बने दीये, लालटेन, पेट्रोमैक्स, ग्वालन और ओरछा के राम दरबार जैसी कलाकृतियां मेले में आकर्षण का केंद्र हैं। उद्घाटन अवसर पर हथकरघा विभाग के संजय श्रीवास्तव, उप संचालक उमेश श्रीवास्तव, खादी एवं ग्रामोद्योग के उप संचालक नीरज उइके और मेला प्रभारी अरविंद शर्मा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
पारंपरिक कला को मिल रहा नया मंच
मेले में शामिल शिल्पी राधा प्रजापति, धमना-खजुराहो और धनीराम प्रजापति सहित अन्य कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। मिट्टी से तैयार दीपावली के विशेष उत्पादों के माध्यमसे कारीगरों ने पारंपरिक शिल्प को नई पहचान देने का प्रयास किया है। इन कलाकृतियों में स्थानीय संस्कृति और धार्मिक आस्था की झलक भी देखने को मिलती है। दीपावली के लिए विशेष रूप से तैयार की गई सजावटी सामग्री भी मेले में उपलब्ध है। प्रभात सिसौदिया सहित अन्य शिल्पियों ने घरों को सजाने के लिए तोरण, बंदनवार और विभिन्न सजावटी वस्तुएं तैयार की हैं। कविता मिश्रा ने भी पारंपरिक सजावटी उत्पादों के माध्यम से अपनी कला का प्रदर्शन किया है। इन वस्तुओं में पारंपरिक शिल्प और त्योहार की सजावट का सुंदर मेल देखने को मिल रहा है।
पारंपरिक दीयों की विविधता बनी आकर्षण
मेले में विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट शिल्प परंपराओं से जुड़े उत्पाद भी प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें बस्तर में बनने वाला लमानिया दीया भी शामिल है। इस तरह के पारंपरिक उत्पादों के माध्यम से प्रदेश के बाहर की लोककला और शिल्प परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है।
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